मेघ


मेघ – चिराग पटेल

बरसती अमृत धारा धरा के अंगो पर;
अभ्र वारिद वाणी मुदिर मतंग,
नंदनु चारु पर्वताशय नीलाभ;
बरसती अमृत धारा धरा के अंगो पर

ओदन वातध्वज अंबुभ्रुत श्याम,
कंध वारमुच शारद उज़्झक,
सुदामन नभोधूम पुरुभोजस;
सर्वव्यापी सोम पुष्ट करें समग्र सृष्टि।

वारिददेव गगनध्वज देव विहंग,
वराह दर्दरिक अंबुद शिरिंबिठ,
वारिर वनिन पयोगर्भ नभोश्वर;
गर्जन अनोखे तांडव नृत्य दिखलाती।

पाथोद शद्रि क्षर पयोवाह मेघ,
वातरथ अंबुमुच जीवथ सलिलद,
कच वर्ष उदकधर वारिगर्भ;
इन्द्र छिपाते रुद्र छिपाते, ताप भी छिपाते।

अद्रि घन नभोध्वज वनद,
धाराट पर्णशन विषद अशन,
अहि दर्दुर केतुभ अम्बुधर;
अनेक जीवन खिलते प्रेम किल्लोल।

जलवाह उदहार वंठर कंधर,
परजन्य वायुदार अंभोद स्यमीक,
पारण वर्षधर धाराधर गवेडु;
“रोशनी” फैलती नभोमण्डल “दीप” प्रसारित।

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