आत्मबोधोपनिषद


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१.२ अथ यदिदं ब्रह्मपुरं पुण्डरीकं तस्मात्तडिताभमात्रं दीपवत्प्रकाशम् ॥

यह हृदय कमल है वही ब्रह्म का स्थान है| वही ऐसा क्षेत्र है जो विद्युत अथवा दीपक समान प्रकाशित होता है ||

This lotus like heart is brahman’s place. This is the place which brightens like thunder or lamp.

१.४ सर्वभूतस्थमेकं नारायणं कारणपुरुषमकारणं परं ब्रह्मों||
१.५ शोकमोहविनिर्मुक्तो विष्णुं ध्यायन्न सीदति | द्वैताद्वैतभयं भवति मृत्यो: स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ||

सर्व भूतोंमे वास कर्ता एकमेव नारायण ही कारणरूप विराट पुरुष है | वह स्वयं कारण रहित है, परब्रह्म है, ॐकार स्वरूप है| इस तरह विष्णु का चिंतन करते हुए मनुष्य कभी मोह और शोक से पीड़ित नहीं होता | वह द्वैत-अद्वैत और मृत्यु के भय से रहित होता है | जो व्यक्ति ब्रह्म में भेद देखता है वह अनेक बार मृत्यु को प्राप्त होता है |

“narayana” who resides in everything, is that “viraat purusha” who is cause of everything. “narayana” is above any cause. “narayana” is “parabrahman”. “narayana” is AUM ॐ. One who is imbibed in “vishNu” like this, becomes free from pain of bondage and grief. S/he becomes free from duality, non-duality and death. One who sees distinction in “brahman” has to go thru repeated deaths.

१.६ ह्रत्पद्ममध्ये सर्वं यत्तत्प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम । प्र्ज्ञानेत्रो लोकः प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥
१.८ यत्र ज्योतिरजस्त्रं यस्मिंल्लोकेअभ्यर्हितं तस्मिन्मां देहि स्वमानमृते लोके अक्षते अच्युते लोके अक्षते अमृतत्त्वं च गच्छति ॐ नमः ॥

ह्रदय कमल मध्य जो सर्व रूप है वह प्रज्ञान में प्रतिष्ठित है (ह्रदय में चेतना है) | यह लोक प्रज्ञा रूप नेत्र से युक्त है (सर्वत्र चेतना है) | प्रज्ञा ही प्रतिष्ठा है और वह ब्रह्म है (आत्म चेतना ही ब्रह्म है) |

जहां स्थिर ज्योति है वहा सर्व प्राणी की सेवा होती है| ऐसे अखंड लोक में मुझे स्थान दे | यह अविनाशी स्थान में वास कर जीव मुक्त हो कर अमृत तत्व पा लेता है | वह ॐ को नमस्कार |

That which is within lotus like heart delves in “praJnaan” (Consciousness lies within heart). This world comprises of eye of this “praJnaan” (this consciousness is everywhere). “praJnaan” pervades everything and that is “brahman” (Consciousness pervades everything and that is universal consciousness).

All “jeeva” (souls) are served where there is unwavering light. Grant me such place. “jeeva” (soul) becomes free and gets nectar by living in that indestructible place. I bow to such ॐ AUM.

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